फांसी की सजा के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, फांसी को संवैधानिक रूप से वैध माना

मौत की सजा में फांसी के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

नई दिल्ली: मौत की सजा को लागू करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने फांसी के जरिए मौत की सजा देने के मौजूदा तरीके की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी है। कोर्ट ने माना कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत फांसी देना संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन साबित नहीं हुआ है।

फांसी के तरीके को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने के बजाय कोई अधिक मानवीय और कम पीड़ादायक तरीका अपनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने फांसी के स्थान पर दूसरे विकल्पों पर विचार करने की मांग की थी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा समय में ऐसा पर्याप्त वैज्ञानिक या चिकित्सकीय प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि कोई वैकल्पिक तरीका फांसी से स्पष्ट रूप से अधिक मानवीय या कम पीड़ादायक है।

पुराने फैसले को बड़ी पीठ के पास भेजने से भी इनकार

अदालत ने 1983 के Deena v. Union of India फैसले को बड़ी पीठ के पास दोबारा विचार के लिए भेजने से भी इनकार कर दिया। उस फैसले में फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में उस पुराने फैसले की कानूनी और वैज्ञानिक बुनियाद को बदलने वाला पर्याप्त नया प्रमाण पेश नहीं किया गया है।

वैकल्पिक तरीके पर भविष्य में हो सकता है विचार

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा है, लेकिन अदालत ने भविष्य के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। कोर्ट ने कहा कि अगर आगे चलकर ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आते हैं, तो इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा की संभावना बनी रहेगी।

इसके अलावा केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति गठित कर मौत की सजा लागू करने के मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा करा सकती है। ऐसी समिति में कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और पेनोलॉजी जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल किए जा सकते हैं।

फिलहाल फांसी का मौजूदा तरीका जारी रहेगा

फैसले के बाद भारत में सामान्य आपराधिक कानून के तहत मृत्युदंड लागू करने के तरीके को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है। फिलहाल फांसी ही मौत की सजा लागू करने का वैध तरीका बनी रहेगी। हालांकि भविष्य में नए वैज्ञानिक या चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर इस व्यवस्था की दोबारा समीक्षा संभव है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मृत्युदंड, कैदियों के अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े कानूनी विमर्श के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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