भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ का खतरा? रूस से तेल खरीदने पर नए प्रतिबंधों का क्या मतलब है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फाइल फोटो, भारत पर संभावित 100% अमेरिकी टैरिफ के बीच

India पर 100% US Tariff का खतरा: रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका का नया Sanctions Bill क्या है?

अमेरिका में रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को और कड़ा करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत भी इस प्रस्तावित कार्रवाई के दायरे में आ सकता है।

हालांकि, फिलहाल भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से पारित बिल को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से मंजूरी मिलनी बाकी है। इसके बाद ही यह राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा। कानून बनने के बाद भी टैरिफ लगाना अपने आप शुरू नहीं होगा, बल्कि इस संबंध में अंतिम फैसला ट्रंप के अधिकार क्षेत्र में रहेगा।

क्या है रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाला बिल?

अमेरिकी सीनेट ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 86-11 के वोट से पारित किया है। प्रस्तावित कानून में रूस के तेल और गैस के बड़े खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है।

इस सूची में फिलहाल चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं।

विधेयक में ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाने का प्रावधान है। इसके अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, रूसी अरबपतियों, वरिष्ठ अधिकारियों और क्रेमलिन से जुड़े वित्तीय संस्थानों पर नए प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिल अपने आप 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं करता। पहले इसे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होना होगा और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बनना होगा। इसके बाद भी टैरिफ लगाने का निर्णय कार्यकारी स्तर पर लिया जाएगा।

भारत पर खतरा क्यों बढ़ा?

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव आया। भारत ने इस दौरान रूस से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल की खरीद काफी बढ़ाई। इससे भारतीय रिफाइनरियों को लागत नियंत्रित रखने और ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिली।

भारत अब चीन के बाद रूसी कच्चे तेल का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ने के बाद रूसी तेल पर भारत की निर्भरता और महत्वपूर्ण हो गई।

अमेरिका पहले ही रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है। अगस्त 2025 में अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाया था। इसके बाद कुछ भारतीय निर्यातों पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 फीसदी तक पहुंच गया था।

इसके बावजूद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में बड़ी कमी नहीं की। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में रूसी क्रूड का भारत में आयात तेजी से बढ़ा और जून में इसमें करीब 34 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई।

भारत का लगातार यही कहना रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है।

अमेरिकी सांसदों की क्या राय है?

रूस की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा खरीद के जरिए समर्थन देने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने के पक्ष में अमेरिकी सांसदों का एक वर्ग इस विधेयक का समर्थन कर रहा है। सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भी रूस के खिलाफ प्रतिबंधों और प्रस्तावित टैरिफ को यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में जरूरी बताया है।

हालांकि, सभी सांसद इस प्रस्ताव के समर्थन में नहीं हैं। कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने आशंका जताई है कि विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप को टैरिफ लगाने की बहुत व्यापक शक्तियां दे सकता है। उनका तर्क है कि इसका असर रूस पर दबाव बढ़ाने के बजाय अमेरिका के दूसरे देशों के साथ व्यापारिक विवादों को भी बढ़ा सकता है और अंततः इसका बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

सीनेट में रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और डेमोक्रेट सीनेटर रॉन वाइडन ने भी 100 फीसदी टैरिफ वाले प्रावधान पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इस तरह का कदम भारत के साथ अमेरिका के संबंधों पर दबाव डाल सकता है, जबकि इससे भारत की रूस से तेल खरीदने की नीति में जरूरी बदलाव हो, यह तय नहीं है।

अब आगे क्या होगा?

सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद बिल अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास जाएगा। प्रतिनिधि सभा के 31 अगस्त को दोबारा बैठक शुरू करने के बाद इस पर विचार किया जाना है।

अगर हाउस भी इसे मंजूरी देता है, तो बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा। कानून बनने के बाद ही संभावित टैरिफ को लेकर आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

इस बीच, प्रस्तावित कानून में संभावित छूट यानी carve-outs को लेकर भी चर्चा हुई है। कुछ सीमित मात्रा में रूसी गैस खरीदने वाले देशों को कुछ परिस्थितियों में राहत देने की संभावना पर बात की गई है।

इसलिए भारत पर वास्तव में कितना अतिरिक्त टैरिफ लगेगा या भारत को किसी तरह की छूट मिलेगी, यह अभी तय नहीं है। बिल का अंतिम स्वरूप और राष्ट्रपति ट्रंप का फैसला ही यह स्पष्ट करेगा कि रूस से भारतीय तेल खरीद का अमेरिका-भारत व्यापार पर कितना असर पड़ेगा।

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