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लखनऊ: बसपा के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में पार्टी के सामने बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया है। बलिया की रसड़ा सीट से विधायक रहे उमाशंकर सिंह के निधन के साथ ही यूपी विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व खत्म हो गया है। विधान परिषद में पार्टी पहले ही शून्य पर है। अब नवंबर 2026 में राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल पूरा होने के बाद संसद में भी बसपा का कोई सदस्य नहीं रह सकता है।
55 वर्षीय उमाशंकर सिंह का बुधवार देर रात लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ। 2022 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा पूरे उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीत सकी थी, तब रसड़ा से उमाशंकर सिंह ने पार्टी का खाता खोला था। उनकी जीत को उनके व्यक्तिगत जनाधार से भी जोड़कर देखा गया, क्योंकि बसपा के कमजोर होते राजनीतिक प्रभाव के बावजूद उन्होंने रसड़ा में अपनी पकड़ बनाए रखी थी।
बसपा का राजनीतिक आधार उत्तर प्रदेश से ही जुड़ा रहा है। पार्टी के गठन के बाद यूपी में उसका प्रभाव लगातार बढ़ा और मायावती चार बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन लगातार कमजोर हुआ है।
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ रसड़ा सीट पर जीत मिली थी। उमाशंकर सिंह इस सीट से विधायक चुने गए थे। अब उनके निधन के बाद विधानसभा में पार्टी का एकमात्र प्रतिनिधित्व भी खत्म हो गया।
विधान परिषद में भी बसपा के पास फिलहाल कोई सदस्य नहीं है। 2024 में पार्टी के एकमात्र विधान परिषद सदस्य भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल पूरा होने के बाद बसपा उच्च सदन में वापसी नहीं कर सकी।
लोकसभा चुनाव 2024 में बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। फिलहाल संसद में पार्टी का प्रतिनिधित्व राज्यसभा सांसद रामजी गौतम के जरिए है।
रामजी गौतम का छह साल का राज्यसभा कार्यकाल नवंबर 2026 में पूरा होने वाला है। उत्तर प्रदेश से जिन 10 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है, उनमें रामजी गौतम भी शामिल हैं।
अगर उनके कार्यकाल के बाद बसपा का कोई नया सांसद राज्यसभा नहीं पहुंचता है, तो संसद में भी पार्टी का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। यानी यूपी विधानसभा, विधान परिषद और संसद—तीनों जगह बसपा की राजनीतिक मौजूदगी बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच जाएगी।
कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। 1989 के चुनाव में पार्टी ने पहली बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की। उस समय यूपी विधानसभा में बसपा के 13 विधायक जीते थे और लोकसभा में भी पार्टी के तीन सांसद पहुंचे थे।
इसके बाद बसपा ने यूपी की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई। 1993 में सपा के साथ गठबंधन के बाद पार्टी के 67 विधायक विधानसभा पहुंचे। मायावती भी राज्यसभा की सदस्य बनीं और बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।
लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी का वोट शेयर भी 3.66 फीसदी से घटकर 2.04 फीसदी रह गया।
बसपा के कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन का असर उसके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में सीट जीतने के मानक पर सफल नहीं रही और उसका राष्ट्रीय स्तर का वोट शेयर भी काफी कम हुआ है।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए तय अलग-अलग मानकों में से बसपा फिलहाल कई कसौटियों पर कमजोर स्थिति में दिखाई देती है। चार या उससे अधिक राज्यों में क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता वाला मानक भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है।
इस तरह उमाशंकर सिंह का निधन सिर्फ बसपा के एक विधायक के जाने तक सीमित नहीं है। इससे उत्तर प्रदेश में पार्टी का विधानसभा प्रतिनिधित्व भी समाप्त हो गया है। वहीं नवंबर में रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म होने के बाद अगर कोई नया सदस्य राज्यसभा नहीं पहुंचता है, तो बसपा की संसद में भी आवाज खामोश हो सकती है।